महादेवी वर्मा
सुश्री महादेवी वर्मा की स्मृति में वर्ष २००७ को शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। यहाँ है महादेवी जी पर कुछ विशेष प्रस्तुति।
Sunday, April 29, 2007
महादेवी वर्मा के प्रति
महादेवी वर्मा विभिन्न विद्वानों की राय में-
' छायावादी कहे जाने वाले कवियों में महादेवी जी ही रहस्यवाद के भीतर रही हैं। उस अज्ञात प्रियतम के लिए वेदना ही उनके हृदय का भावकेन्द्र है जिससे अनेक प्रकार की भावनाएँ, छूट छूटकर झलक मारती रहती हैं। वेदना से इन्होंने अपना स्वाभाविक प्रेम व्यक्त किया है, उसी के साथ वे रहना चाहती हैं। उसके आगे मिलनसुख को भी वे कुछ नहीं गिनतीं। वे कहती हैं कि – मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ।। इस वेदना को लेकर इन्होंने हृदय की ऐसी अनुभूतियाँ सामने रखी हैं जो लोकोत्तर हैं। कहाँ तक वे वास्तविक अनुभूतियाँ हैं आर कहाँ तक अनुभूतियों की रमणीय कल्पना है, यह नहीं कहा जा सकता ।
एक पक्ष मेा अनंत सुषमा, दूसरे पक्ष में अपार वेदना, विश्व के छोर हैं जिनके बीच उसकी अभिव्यक्ति होती है—
यह दोनों दो ओरें थीं
संसृति की चित्रपटी की
उस बिन मेरा दुख सूना
मुझ बिन वह सुषमा फीकी ।
पीड़ा का चसका इतना है कि —
तुमको पीड़ा में ढूँढ़ा
तुममें ढूँढूगी पीड़ा ।
[ -रामचन्द्र शुक्ल
हिन्दी साहित्य का इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, उन्नीसवां संस्करण, संवत् — २०३८, पृष्ठ– ४८७ ]
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